शनिवार, ४ अप्रैल २००९

जिन्दगी खुबसूरत है

एक नई कविता लिखने का प्रयास किया है। कुछ मेरा अनुभव है बाकी जिन्दगी की जो हकीकत मुझे समझ आई वो मैंने शब्दों में पिरोया है।

घनी धूप में ठंडी छांव महसूस करके तो देखो।
जिन्दगी बहुत खुबसूरत है जरा नजदीक से देखो।
कभी शबनम भी जला देती है कभी आग मजा देती है।
ये जिन्दगी है दोस्त एक पल में हंसा देती है , तो कभी आसुओं की झडी लगा देती है।
बहार मे भी पतझड़ के वीराने देखे हैं यहां शमा के लिए जलते परवाने देखे हैं यहां।
अफ़सोस न कर की हर लम्हा रुला देता है वही तो है जो गम मे भी जीना सिखा देता है।
किसी ने जन्नत को देखा नहीं यहां फिर क्यों तू जहन्नुम की सोच से डरता है।
हर पल को गुजार दे यूँ की वीराने में भी बहार आ जाए।
बस याद रह जाए तेरा जीना इस जहाँ को , क्या पता तुझे देख के किसी उदास चेहरे पे मुस्कान छा जाए।
कोई मयखाने मे गम बेंचकर खुशी तलाशता है , जो अलमस्त फकीर है जिन्दगी का वो सिर्फ़ मुस्कान बाटता है।
सागर की लहरों सी मौजें उठती हैं तराने भी अफसाने हो जाते हैं।


लहर उठती है और बहाकर साथ ले जाती है , अपने भी यहाँ बेगाने हो जाते हैं।

इस लहर की ताल को महसूस तो कर फिर देख जिन्दगी के हर तराने पे नम तेरा है और फसाने भी कैसे तेरे अफसाने हो जाते हैं।

मंगलवार, २४ मार्च २००९

अहसास की लौ हूं तनहा

कुछ लाइने थी जो आपसे बाटना चाहता हूँ यों तो मैं इस समय ब्लॉग मे लिख नहीं पा रहा हूँ । न लिख पाने की तड़फ को शायद कोई समझ पता .......
यही आवाज का मौसम है न टालो मुझको
सवालों से निपटने दो सवालों मुझको
मै खरा सिक्का हूँ जब चाहे चला लो मुझको
सरे बाजार न रह-रह के उछालो मुझको
आईने आज की तहजीब के सब पत्थर है,
फिर से ढूढों मेरे माझी के हवालों मुझको
मेरा क्या मै तो अहसास की लौ हूँ तनहा
जी में जब आये जला लो की बुझा लो मुझको
ये लाइने मेरी तो नही है पर जिसकी भी है खूबसूरत हैं ।

बुधवार, १८ फरवरी २००९

लुटे हुए अरमानो की तुझे प्यास क्यों है

दिलों मे नफरत की हवा घुलने लगी है ।
बात कैसे करूँ प्यार की जब हर तरफ़ ये आबो हवा बहने लगी है ।
चुभन सी कुछ अपने आप से और घुटन होने लगी है ।
अब जिन्दगी यों सुलझकर भी क्यो उलझने लगी है ।
मैं कौन हूँ जो मुझे ये जलन होने लगी है ।
एक अहसास खोया सा है और लुटे -लुटे ख्वाब क्यो है
आज इस सवाल के जवाब मे वो क्या कहते
बोले लुट चुके अरमानो की तुझे प्यास क्यो है ।
ख़ुद से मह्फूस रखा था ख़ुद को ।
फिर इस ज़हर की जिन्दगी को तलाश क्यो है ।
साकी भी हम मयकदा भी हमारा है ।
अब क्या रोकेगी दुनिया जब साकी ही पिलाने और पीने वाला है ...

गुरुवार, १८ दिसम्बर २००८

हाँ मैं ''आवारा'' हूँ

एक कविता लिखी थी बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर कुछ लिखने का मन हुआ तो इसे ही लिख रहा हूँ।
जिन्दगी की हर सोच में तर्रनुम ऐंसा है कि जीना महज अब जहन्नुम जैंसा है।
ये मायूसी मेरे किरदार में नहीं है ये नशा है जो जिन्दगी से जाता नहीं है।
ज़हर पी गया हूँ कब ये समझ आता नहीं है।
ये ज़हर जिन्दगी को पी रहा है मालूम है मुझे।
इस ज़हर से बचने का रास्ता नजर आता नहीं है।
ये शुरुर है इस नशे का जिसके बिन जिया जाता नहीं है ।
आवारगी का ये तरन्नुम जिन्दगी की उलझनों का श्बबहै।
इसे बेबसी भी किस लिहाज से कहूँ अब तो मेरी हर साँस का फसाना ये है।
इस आवारगी में ही जिए हैं हम बस इसी में मर जाना है।
ये आवारगी भी अपने शय की है।
जरा तराश लेने दो इसे मुझे सारे जमाने को ''आवारा ''बनाना है।

बुधवार, ३ दिसम्बर २००८

''किसी की जान गई और इनकी अदा ठहरी''

आतंकवादी घटनाओं के प्रति राजनेताओं की सपाट बयानबाजी उनके गैरजिम्मेदाराना रवैये को दर्शाती है। पिछले एक वर्षों से लगातार हो रही आतंकवादी गतिविधियों से जनता को निजात दिलाने में ये हुक्मरान निक्कमे साबित हुए हैं अब सरकार से आशा करना तो ''भैंस के सामने बीन बजाना है '' ऐंसे मे कम से कम मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी को समझा तो है पर टीक ढंग से निभाया नहीं है जब मुंबई धमाकों और दहशत के जीवन्त पलों को लोग घर में बैठे देख रहे थे तो उनमें जिन्दगी जीने की ललक बढती जा रही थी पर डर का कोई पारावार न था । वहीं बच्चों की मानसिक व्यथा को समझ पाना टीआरपी में उलझे टीवी चैनलों के लिए मुश्किल है कमांडो की बहादुरी और गलतियों पर भी लोगों की निगाहें थी। सारा विश्व एटीएस चीफ की चूक को देख रहा था विश्व पटल पर देश की छवि को किरकिरा करने में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी है वहां गोली लगी उनकी जान गई और ये लाइव दिखा रहे हैं ये तो वही बात हुई की ''किसी की जान गई और इनकी अदा ठहरी''

बुधवार, २६ नवम्बर २००८

संवेदना की शव-यात्रा है बढ़ते बम धमाको की मात्रा




न सुपाड़ी निकली न सरौता निकला माँ के बटुए से दुआओं का वजीफा निकला
हमने मार दिया जिसे एक निवाले के लिए वो परिंदा भी कई दिनों का भूंखा निकला

ये लाइने भीं मानव मन को झंकृत कर देने को काफी हैं, परन्तु ब्यक्ति मे संवेदना होनी चाहिए आज हमारा देश आतंक की भट्टी में जल रहा है न जाने ये आग कब ठंडी होगी। अब तो आमजन की पीड़ा को, जनता के भय को समझने के लिए संवेदना की जमीन ही बची है। आज बहुत ही भय के वातावरण में हर आमों खाश साँस ले रहा है । जिम्मेदारी किसकी है ये बहस तो चलती रहेगी...

अंतहीन शव -यात्रा ,ये अंतहीन शव -यात्रा
बस धमाकों का कहर और बिखरते ये शहर
बरसते आंसुओं की बढ़ी है मात्रा
मर गई वो संवेदना जो दिखाती रास्ता
खून ही है धर्म इनका, बहता होगा इनकी भी रगों में
जब लाल है सबका लहू तो फिर नहीं क्यों वास्ता
हां धमाका फिर हुआ है लहू का दरिया बहा है
हर बार गिनकर रह गए बरबस ही सब ये सह गए
मौत न जाने आए किधर से सब डर रहे हैं इस कदर से
किसके नकारे होने को कहे और कहाँ तक कहते रहें
सब यों ही सहते हैं चुपचाप रहते हैं
जब कभी तनहा से होते है तो जाने वालों की यादों में चुपचाप रोते हैं
ये धमाकों ने दिया है दर्द ये आंसू
और एक दूजे से अलग होकर तडफती आत्मा
ये दिलों की आग ले जाए जाने कहाँ
और कितने बेघर होंगे कितनी सफेद होंगीं साडिया
कटघरे में आज भी हैं जो दिलों में आग लेके जीते हैं
हम यों ही बस आग को ठंडक समझकर जी लेते हैं
हालेदिल किस्से बयां करें
जब देश के धुरंधर ही बयानबाजियों में ही अपनी रछा समझ लेते
हैं कहने को बेदर्द जमाना भी यही कहता है की हर कोई धमाकों के बाद कितना सहमा होता है
ये राह पर चलने वाले उस मुसाफिर से पूंछ जिसने चिथड़े उड़ते देखे हैं वहां
बंगलों पर सुकून से बैठने वालों ने तो झाँककर देखा भी नहीं होगा ...


बुधवार, ५ नवम्बर २००८

चुनाव आ रहे हैं

ॐ ऐ ह्रीं क्लीं चामुंडाय विच्चे
सभल के रहना बच्चे ।
ॐ कांय कांय कांय कांय।
क्या करें कहाँ जांए ।
बोट- सपोट सब पुकारे खिसक रहे हैं प्राण हमारे
ॐ प्रचार ॐ नारे ।
ॐ दंगे ॐ प्रलोभन जनता का कर रहे हैं दोहन।
राजनीति का ये पहलू है नेता सब दलबदलू हैं ।
जनता का जो रोना है इन्हें बोट उसी पर लेना है ।
सफेद पोश लिबासों में अपने काले वादों में ।
हर बार कामयाब होते हैं इन इरादों में ।